स्पाइनल इन्फेक्शन एक तरह का रेयर इन्फेक्शन है, जो रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क स्पेस, कशेरुकाओं और स्पाइनल कैनाल या उसके आस-पास के सॉफ्ट टिश्यूज को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह इन्फेक्शन बैक्टीरिया की वजह से ही होता है और रक्त वाहिनियों के जरिए यह बैक्टीरिया रीढ़ की हड्डी तक फैल जाता है।

डॉ. अरविंद कुलकर्णी
। हेड, मुंबई स्पाइन स्कोलियोसिस एंड
डिस्क रिप्लेसमेंट सेंटर, बॉम्बे हॉस्पिटल, मुंबई ।

रक्तवाहिकाओं के जरिए बैक्टीरिया वर्टिब्रल डिस्क में फैल जाता है, जिससे डिस्क और उसके आस-पास के हिस्सों में इन्फेक्शन होने लगता है और डिसाइटिस होने का खतरा पैदा हो जाता है। डिसाइटिस भी एक तरह का इन्फेक्शन ही है, जो रीढ़ की हड्डी की अंदरूनी डिस्क में होता है। जैसे-जैसे यह इन्फेक्शन बढ़ने लगता है, डिस्क के बीच का स्पेस कम होने लगता है और डिस्क के डिजॉल्व होते रहने की वजह से इन्फेक्शन डिस्क स्पेस के ऊपर और नीचे की तरफ शरीर के अन्य अंदरूनी हिस्सों में भी फैलने लगता है, जिससे ओस्टियोमायलाइलिटिस हो जाता है।

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कुछ परिस्थितियां स्पाइनल इन्फैक्शन से पीड़ित मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर काफी प्रभाव डालती हैं और मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती हैं। इनमें डाइबिटीज मेलिटस, रोग प्रतिरोधक क्षमता को दबाने या कम करने वाली दवाइयों का इस्तेमाल, कुपोषण, ऑर्गन ट्रांस्पलांट की हिस्ट्री और नसों के जरिए लिए जाने वाले नशीले पदार्थों के सेवन जैसी परिस्थितियां शामिल हैं। स्पाइनल इन्फेक्शन सामान्यतः स्टेफिलोकॉकस ऑरियस बैक्टीरिया की वजह से होता है, जो आमतौर पर हमारे शरीर की स्किन में रहता है। इसके अलावा इस्चेरिचिया कोली, जिसे ई-कोलाई बैक्टीरिया भी कहा जाता है, उससे भी यह इन्फेक्शन हो सकता है। ज्यादातर स्पाइन इन्फेक्शंस लंबर स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी के मध्य या निचले हिस्से में होते हैं, क्योंकि इसी हिस्से से रीढ़ की हड्डी में ब्लड सप्लाई होता है। इसके बीज पेल्विक इन्फैक्शन, यूरिनरी या ब्लैडर इन्फेक्शन, निमोनिया या सॉफ्ट टिश्यू इन्फैक्शन में होते हैं। नसों के जरिए लिए जाने वाले नशे से संबंधित इन्फैक्शन में ज्यादातर गर्दन या सर्वाइकल स्पाइन प्रभावित होती है।

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दुर्भाग्य से वयस्कों में स्पाइनल इन्फेक्शन बहुत धीमी गति से फैलता है और इस वजह से उसके लक्षण बहुत कम नजर आते हैं, जिसके कारण काफी देर से इसका पता चलता है। कुछ मरीजों को तो डायग्नोज किए जाने के कुछ हफ्ते या महीने पहले ही इसके लक्षणों का अहसास होना शुरू होता है। इसके लक्षण आमतौर पर गर्दन या पीठ के किसी हिस्से में टिंडरनेस आने के साथ शुरू होते हैं और पारंपरिक दवाइयां लेने और आराम करने के बावजूद मूवमेंट करते वक्त महसूस होने वाला दर्द कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता ही जाता है। इन्फेक्शन बढ़ने पर बुखार होना, कंपकंपी आना, नाइट पेन या अप्रत्याशित तरीके से वजन घटना आदि लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। हालांकि ये वो सामान्य लक्षण नहीं हैं, जो हर मरीज में, खासतौर पर लंबे समय से बीमार चल रहे मरीज में दिखाई देते हों। शुरुआत में मरीज को पीठ में बहुत तेज दर्द होने लगता है, जिसके कारण शरीर का मूवमेंट भी लिमिटेड हो जाता है। अगर स्पाइनल इन्फेक्शन होने की आशंका है, तो लेबोरेटरी इवेल्यूएशन और रेडियोग्राफिक इमेजिंग स्टडीज कराना बेहद जरूरी हो जाता है।ज्यादातर स्पाइनल इन्फेक्शंस के ट्रीटमेंट में नसों के जरिए दिए जाने वाले एंटीबायोटिक्स का कॉम्बिनेशन शामिल होता है। इसके अलावा ब्रेसिंग कराने और रेस्ट करने की सलाह भी दी जाती है। चूंकि इन्फेक्शन की वजह से वर्टिब्रल डिस्क में ब्लड सप्लाई सही तरीके से नहीं हो रही होती है, इसलिए बैक्टीरिया की मौजूदगी की वजह से बॉडी की इम्यून सेल्स और एंटीबायोटिक दवाइयां भी इन्फेक्शन से प्रभावित हिस्से तक आसानी से नहीं पहुंच पाती हैं। ऐसे में आमतौर पर 6 से 8 हफ्तों तक आईवी एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा इन्फेक्शन में कमी आने पर रीढ़ की हड्डी की स्टेबिलिटी को सुधारने के लिए ब्रेसिंग कराने की सलाह भी दी जाती है। अगर एंटीबायोटिक्स और ब्रेसिंग से भी इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं होता है या नसें सिकुड़ने लगती हैं, तब सर्जिकल ट्रीटमेंट जरूरी हो जाता है। आमतौर पर इन्फेक्शन को दूर कर दर्द से निजात पाने, रीढ़ की हड्डी में आ रही विकृति को बढ़ने से रोकने और नसों पर पड़ रहे किसी भी अन्य तरह के दबाव को कम करने के लिए सर्जरी की जाती है। उपचार के आगे बढ़ने के साथ ही समय-समय पर ब्लड टेस्ट और एक्स रे कराने की जरूरत भी पड़ती है, ताकि यह वेरिफाई किया जा सके कि ट्रीटमेंट का असर हो रहा है कि नहीं और इन्फेक्शन में कमी आ रही है या नहीं। ऐसे सभी लोग, जिन्हें स्पाइनल इन्फेक्शन होने की आशंका है, उन्हें तुरंत इलाज करवाना चाहिए। खासतौर से जिन लोगों को न्यूरोलॉजिकल कॉम्प्रमाइज के लक्षण नजर आ रहे हैं, उन्हें तो तुरंत जांच करवानी चाहिए।

By VASHISHTHA VANI

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