• आलेख: रामस्वरूप रावतसरे
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मुंबई की एक विशेष अदालत ने धनशोधन के मामले में गिरफ्तार शिवसेना के सांसद संजय राउत को सोमवार को चार अगस्त तक के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में भेज दिया था। इस पर संजय राउत ने कहा कि उन्हें विपक्ष में होने के नाते फसाया जा रहा है। संजय राउत एक मखर नेता है। उनके ब्यानों ने हमेशा सुर्खियां बटोरी है।

अब जब उनके काले कारनामों ने सुर्खियां बनना शुरू किया है तो उन्हें फसाने का दर्द सताने लगा है। पार्थ चटर्जी ने और उनके समर्थकों ने भी यही कहा था, लेकिन ज्यों ज्यों पर्दा हटा उसी प्रकार पार्टी और सरकार ने भी उनसे दूरी बना ली है। संजय राउत दूसरों का रायता बिखेरकर भी जिस आत्म विश्वास से अपना पक्ष रखते थे, उसी प्रकार ईडी का भी सामना करें। सत्य को ऑंच कहां हो सकती है।

ईडी संजय राउत को विपक्ष में होने की सजा दे रहा है? उन पर ज्यादती की जा रही है। हमारे यहां नेताओं के प्रति ये सहानुभूति कोई नई नहीं है। जब भी किसी नेता पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते हैं तो, वे इसे राजनीति से जोड़ देते हैं। क्या भ्रष्टाचार के आरोपों में की गई कार्रवाई से ये कहते हुए बचा जा सकता है कि सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है? यानी राजनीति के सहारे नेता पूरे मामले को गोलमोल कर जाते हैं और उनके द्वारा किए गए घोटालों और भ्रष्टाचारों पर ईमानदारी से कभी कोई बात होती ही नहीं। संजय राउत पर लगे तमाम आरोपों का सच जनता के भी सामने आना चाहिए और इस बात का भी विश्लेषण होना चाहिए कि जिस देश में ईमानदारी का सारा बोझ आम आदमी पर डाल दिया जाए और नेताओं को बेईमानी करने के लिए खुला छोड़ दिया जाए। उस देश में लोकतन्त्र वाकई खतरे में आ जाता है। ईडी के मुताबिक संजय राउत पर ना सिर्फ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं बल्कि ये दावा भी है कि उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी अधिकारियों को प्रभावित किया। गलत तरीके से सम्पत्ति खरीदी और उनकी पत्नी के बैंक खातों में लाखों रुपये जमा हुए। इस पूरे घोटाले को पात्रा चॉल घोटाले के नाम से भी जाना जाता हैं।

दरअसल, उत्तरी मुंबई के गोरेगांव में एक इलाका है, जिसे सिद्धार्थ नगर कहते हैं। यही सिद्धार्थ नगर पात्रा चॉल के नाम से मशहूर है। लगभग 47 एकड़ की जमीन पर फैले इस इलाके में एक समय 672 घर हुआ करते थे। जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र हाउसिंग एण्ड ऐरिया डवलपमेन्ट ऑथोरिटी ने तय किया कि वो इस इलाके में रहने वाले लोगों को नए घर बना कर देगी और इस जगह को पुनः विकसित किया जाएगा।

पात्रा चॉल में स्थित जो 672 घर थे, वहां के रहने वाले लोगों को ये सपना दिखाया गया कि सरकार बिल्डर्स के साथ मिल कर उन्हें पक्के घर बना कर देगी। यानी हर परिवार का अपना एक फ्लेट होगा। इस सपने ने इन लोगों को एक नई उम्मीद दी और यहां रहने वाले लोग फ्लेटों के लिए अपने घर खाली करने को तैयार हो गए। इसके बाद वर्ष 2008 में एक समझौता हुआ। ये समझौता तीन पार्टियों के बीच हुआ बताया। पहले लोग वो थे, जिनके यहां पर घर हुआ करते थे। दूसरी पार्टी थी, म्हाडा यानी महाराष्ट्र हाउसिंग एण्ड ऐरिया डवलपमेन्ट ऑथोरिटी और तीसरी पार्टी थी एक रियल एस्टेट कम्पनी जिसका नाम था, गुरू आशीष कॉस्ट्रक्सन प्राईवेट लिमिटेड। इस समझौते के तहत इस कंपनी को 47 एकड़ की इस जमीन पर कुल 16 बिल्डिंग तैयार करनी थी। जिनमें पात्रा चॉल के लोगों के लिए 672 फ्लेट तैयार होने थे। इसके अलावा इस कंपनी को म्हाडा को अलग से 1 लाख 11 हजार 476 वर्ग मीटर एरिया के कॉन्सट्रक्शन बिल्ड अप के लिए देना था।

इन सारे निर्माण के बाद जो जमीन बचती, उसे ये कंपनी विकसित करके यानी यहां के प्राईवेट डवलपर्स के साथ फ्लेट बना कर लोगों को बेच सकती थी। हालांकि यहां शर्त ये थी कि इस कंपनी को सबसे पहले 672 फ्लेट तैयार करने थे। लेकिन इसने ऐसा नहीं किया। इस पर आरोप है कि समझौते के विरुद्ध इसने बाकी बची हुई जमीन को पहले ही सात बिल्डर्स को बेच दी। जिससे इस कंपनी को 901 करोड़ रुपये हासिल हुए।

इसके अलावा इस कंपनी ने इसी जमीन पर एक हाउसिंग प्रोजेक्ट भी शुरू किया, जिसे डमंकवूे नाम दिया गया। इस नाम की सोसायटी में कुल 458 फ्लेट बनाए जाने थे और आरोप है कि इस कंपनी ने हाउसिंग सोसायटी में फ्लेट तैयार किए बिना ही एडवांस में फ्लेट बेचकर 138 करोड़ रुपये जुटा लिए। जिस जमीन पर सबसे पहले पात्रा चॉल के लोगों के लिए 672 फ्लेट बनने थे, उस जमीन के काफी हिस्से को बेच कर इस कंपनी ने 1 हजार 39 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम भी जुटा ली और लाभार्थी मुहं ताकते रह गये।

इस में संजय राउत की क्या भूमिका हो सकती है। जिस गुरू आशीष कॉस्ट्रक्सन प्राईवेट लिमिटेड नाम की कंपनी पर आर्थिक गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उस कंपनी में प्रवीण राउत नाम का एक व्यक्ति डायरेक्टर था और प्रवीण राउत संजय राउत के बहुत खास माने जाते हैं। ईडी के मुताबिक प्रवीण राउत ने म्हाडा की जमीन को गलत तरीके से बिल्डर्स को बेचा और एचडीआईएल नाम की निर्माण कम्पनी के माध्यम से 112 करोड़ रुपये की राशि भी जुटा ली। जिसमें से आरोप है कि एक करोड़ 6 लाख रुपये संजय राउत और उनकी पत्नी को मिले।

2009 में प्रवीण राउत के द्वारा संजय राउत की पत्नी वर्षा राउत को 55 लाख रुपये का लोन दिया गया और ये पैसा वर्षा राउत ने एक फ्लेट खरीदने के लिए इस्तेमाल किया। इसके बाद 2011 में प्रवीण राउत की एक कंपनी द्वारा संजय राउत और वर्षा राउत को साढ़े 37 लाख रुपये दिए गए और बड़ी बात ये है कि इस पैसे से संजय राउत और उनकी पत्नी ने गार्डन कोर्ट में एक और फ्लेट खरीदा। ईडी का ये भी दावा है कि प्रवीण राउत की जिस कंपनी से संजय राउत और उनकी पत्नी को साढ़े 37 लाख रुपये मिले, उस कंपनी में उनके द्वारा लाखों रुपये निवेश किए गए थे। संजय राउत ने इस कंपनी में 17 लाख 10 हजार रुपये और उनकी पत्नी ने 12 लाख 40 हजार रुपये निवेश किए थे और ईडी के अनुसार ये पैसा भी उन्हें बाद में वापस मिल गया था और ऊपर से प्रवीण राउत ने इस कंपनी के जरिए साढ़े 37 लाख रुपये अलग से संजय राउत और उनकी पत्नी को दिए। जिससे गार्डन कोर्ट में फ्लेट खरीदा गया. ईडी के अनुसार इसके अलावा एक और कंपनी में निवेश करने के बदले में वर्षा राउत को 13 लाख 94 हजार रुपये मिले थे। इस पैसे का संजय राउत और उनकी पत्नी ने क्या किया, अभी इसकी जांच चल रही है। ईडी ने संजय राउत और उनकी पत्नी से संबंधित एक करोड़ 6 लाख रुपये की मनी ट्रेल का पता लगा लिया है और बाकी मनी ट्रेल की जांच अभी जारी है। जानकारी के अनुसार संजय राउत 2010-11 में मुंबई के अलीबाग में 10 फ्लेट खरीदे। ये सभी फ्लेट वर्षा राउत और स्वपना पाटकर के नाम से खरीदे गए।

इस पूरे मामले में गलत किसके साथ हुआ? संजय राउत के साथ जिन पर एक घोटाला करने वाली कंपनी से सांठगांठ करने और सम्पत्ति बनाने के आरोप हैं? या गलत उन लोगों के साथ हुआ, जिन्होंने पात्रा चॉल में फ्लेट मिलने का सपना देखा था? हमारे यहां जब भी कोई नेता भ्रष्टाचार के किसी मामले में फंसता है तो वो यही कहता है कि उसे फंसाया जा रहा है? संजय राउत कुछ नया नहीं कह रहे हैं। फिर यदि संजय राउत कहीं दोषी नहीं है तो फिर इस प्रकार हल्ला मचाने की क्या आश्यकता थी? ये कहना कि ईडी दबाव में काम कर रहा है या उसका दुरुपयोग हो रहा है, ये असल में इस मामले से बचने का एक बहाना है। उद्धव ठाकरे ने संजय राउत का बचाव किया और कहा कि वो उनके साथ इस मुश्किल वक्त में खड़े हैं। ये अच्छी बात है कि उद्धव ठाकरे को संजय राउत पर पूरा भरोसा है। लेकिन अगर संजय राउत वाकई सही हैं और उन्होंने कुछ नहीं किया तो फिर इस मामले का राजनीतिकरण करने की क्या जरूरत है? जब ये ही नेता लोग यह कहते है कानून से बड़ा कोई नहीं है तो इन्हें भी इस भ्रम को नहीं पालना चाहिए। हमारे यहां सभी प्रकार की ईमानदारी का बोझा जनता के सिर पर है। नेता बनते ही बेईमानी, भ्रष्टाचार के लिए खुली छूट मिल जाती है! लेकिन लगता है अब समय बदल रहा है।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए VANIMEDIA.in उत्तरदायी नहीं है.)

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