कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं। बच्चे ही बड़े होकर देश के विकास को आगे बढ़ाते हैं। कम उम्र में ही बच्चों की प्रतिभा का पता चल जाता है कि आगे चलकर यह विशिष्ट प्रतिभाशाली व्यक्ति बनेगा। मगर दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जो अपने जन्म से पांच साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ही विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होकर मर जाते हैं। इस तरह मरने वाले बच्चों की संख्या बहुत अधिक है। भारत में भी हर दिन पांच साल से कम उम्र के बच्चे बड़ी संख्या में मौत के मुंह में चले जाते हैं।

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आज के वैज्ञानिक युग में बच्चों की इस तरह से मौत होना बहुत ही दुखदाई तो है ही साथ ही दुनिया के सामने एक यक्ष प्रश्न भी है कि नवजात बच्चों की इस तरह से होने वाली मौत को क्यों नहीं रोका जा सकता है। हालांकि पिछली सदी के मुकाबले बच्चों की मौत को काफी हद तक नियंत्रित किया गया है। मगर आज भी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत सभी को दुखी कर रही है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का भी मुकाबला दुनिया ने बड़ी हिम्मत के साथ किया था। भारत सहित दुनिया के कई देशो के वैज्ञानिकों ने मात्र आठ महीनों में ही कोरोना से बचाव की दवा बना कर काफी हद तक कोरोना महामारी पर नियंत्रण पा लिया। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कोरोना जैसी महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है तो फिर बच्चों की होने वाली मौत को क्यों नहीं रोका जा सकता है।

निमोनिया पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मौत का बड़ा कारण है। इसके उपचार में देरी बच्चे की जान के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। उचित देखभाल और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी के चलते नवजात शिशुओं की मौत पर नियंत्रण लगाना कितना मुश्किल है। इसका पता सेव दि चिल्ड्रन संस्था द्वारा जारी की गई रिपोर्ट से चलता है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर साल दस लाख से अधिक बच्चे एक दिन से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते। रिपोर्ट ने प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और जन्म से जुड़ी जटिलताओं को इन मौतों की सर्वाधिक प्रमुख वजह माना है। जन्म के समय उचित देखभाल और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्मिकाओं की जरूरत को तमाम स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यकर्ता रेखांकित करते रहे हैं। इस बात को रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है कि अगर जन्म के समय प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी मौजूद हों तो लगभग आधी मौतों को टाला जा सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं के जानकार मानते हैं कि अधिकांशतः गरीब देशों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। वहां शिशुओं के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना भी बहुत कम होती है। खुद भारत की स्थिति भी इस मामले में बहुत अच्छी नहीं है।

स्वास्थ्य किसी भी देश के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता वाला क्षेत्र होता है। किसी भी समाज की खुशहाली का अनुमान उसके बच्चों को देखकर लगाया जा सकता है। लेकिन जिस समाज में हर साल लाखों बच्चे इस दुनिया में अपना एक दिन भी पूरा नहीं कर पाते वह कैसा समाज होगा इसे बताने की जरूरत नहीं। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं बल्कि एक घृणित अपराध है।

भारत में हर साल 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। इतना ही नहीं कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है। जहां कुपोषण के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुपोषण को चिकित्सकीय आपातकाल करार दिया जाए। उनका कहना है कि ये आंकड़े चैंकाने वाले हैं और अति कुपोषण के लिए आपातकालीन सीमा से ऊपर है। कुपोषण की समस्या को हल करने के लिए पॉलिसी बनाने एवं इसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बजट की आवश्यकता है।

यूनिसेफ ने द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2019 नाम की अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत में पांच वर्ष से कम आयु के हर पांचवें बच्चे में विटामिन ए की कमी है। हर तीसरे बच्चे में से एक को विटामिन बी की कमी है और हर पांच में से दो बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं। भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में 69 प्रतिशत मौतों का कारण कुपोषण है। इस आयु वर्ग में हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप में कुपोषण से प्रभावित है। रिपोर्ट में कहा गया है कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिणी एशिया के देशों से बहुत ही ज्यादा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 40 प्रतिशत बच्चे ग्रोथ की समस्या के शिकार हैं। 60 फीसदी बच्चे कम वजन का शिकार हैं। यह स्थिति चिंताजनक है और युद्ध के पैमाने पर इस समस्या के समाधान के लिए रणनीति बनाया जाना जरूरी है।

सूडान और कई दक्षिणवर्ती अफ्रीकी देशों के 51 प्रतिशत मामलों में किसी प्रशिक्षितकर्मी के मौजूद न होने की बात सामने आई है। इन इलाकों में एक करोड़ की आबादी पर सिर्फ तीन सौ स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहतें हैं। हर साल चार करोड़ महिलाएं किसी प्रशिक्षित कर्मचारी की मदद के बिना बच्चों को जन्म देती हैं। इथोपिया में सिर्फ दस फीसदी जन्म प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मचारी की मदद से होते हैं वहीं ग्रामीण अफगानिस्तान के कुछ इलाकों में तो दस हजार लोगों पर सिर्फ एक स्वास्थ्य कार्मिका होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैसे तो लोगों की सेहत के लिए काफी इंतजाम किए गए हैं और मानवाधिकारों की स्थिति में भी सुधार हुआ है। लेकिन अब भी बहुत से इलाकों और समुदायों में बहुत गहरी असमानता बनी हुई है। इनमें से भी करीब एक चैथाई यानी 25 फीसद मौतें सिर्फ भारत में होती हैं।

भारत ने पिछले पांच दशकों में भले ही चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति करते हुए शिशु मृत्यु दर पर काबू पाया है। लेकिन आज भी शिशुओं की मौत बड़ा सवाल है। वर्तमान में प्रत्येक एक हजार शिशुओं में से 28 की मौत एक साल का होने से पहले ही हो जाती है। भारत के महापंजीयक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार साल 1971 में भारत की शिशु मृत्यु दर 129 थी। जो साल 2020 में बड़े सुधार के साथ 28 पर आ गई है। पिछले 10 सालों में तो इस में 36 प्रतिशत का सुधार देखने को मिला है। साल 2011 में देश की शिशु मृत्यु दर 44 थी जो अब 28 पर आ गई है। ऐसे में कहा जा सकता है कि देश ने चिकित्सा क्षेत्र में बहुत अधिक उन्नति की है।

आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्र की शिशु मृत्यु दर में सबसे अधिक सुधार हुआ है। 2011 में ग्रामीण क्षेत्र में 48 पर रहने वाली शिशु मृत्यु दर साल 2020 में 31 पर आ गई थी। इसी तरह शहरी क्षेत्रों में 2011 में यह 29 पर पर रहने वाली शिशु मृत्यु दर 2020 में 19 पर आ गई थी। पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों की शिशु मृत्यु दर में 35 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 34 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह देश के लिए बड़ी उपलब्धि है।देश के सकल घरेलू उत्पाद का 3.01 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। जो काफी कम है इसे बढ़ाने की जरूरत है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं को दूरस्थ गांव-देहात तक पहुंचाना होगा। देश के हर नागरिक को समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिलना सुनिश्चित हो। तभी भारत में नवजात शिशुओं की मौत पर रोक लगायी जा सकती है।

आलेखः रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं)

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