• पहली बार मरीज में नई पीढ़ी का फ्लो डायवर्टर स्टेंट लगाया

खोपड़ी में उभार के कारण मस्तिष्क की रक्त नलिकाएं कमजोर होने से सेरेब्रल एन्यूरिज्म सूजने लगते हैं। इससे ये फट भी सकते हैं और मस्तिष्क में बड़ी मात्रा में रक्तस्राव भी हो सकता है, जिसे सबआर्कनॉयड हेमरेज (एसएएच) कहा जाता है। यदि सही समय पर इसका इलाज नहीं किया गया तो मरीज को फिर से रक्तस्राव होने की संभावना रहती है और इस बीमारी से शायद ही कोई बच पाता है।

डॉ. विपुल गुप्ता
डायरेक्टर न्यूरोइंटरवेन्शनअग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ
न्यूरोसाइंसेस, आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम

क्षतिग्रस्त सेरेब्रल एन्यूरिज्म लगातार मौत का मुख्य कारण बनता है इसलिए एसएएच को हमेशा आपात स्थिति माना जाता है। समय पर इसका इलाज होने से मरीज के जीवित रहने की संभावना रहती है। एन्यूरिज्म के दोबारा क्षतिग्रस्त होने से पुन: रक्तस्राव को बहुत गंभीर माना जाता है, जिसमें शीघ्र इलाज बहुत महत्वपूर्ण होता है। आधुनिक सर्जिकल और इंटरवेंशनल (एंडोवैस्कुलर) तकनीकों की बदौलत एन्यूरिज्म के ज्यादातर मामलों का पूरी सुरक्षा के साथ सफल इलाज संभव हो सकता है।

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पहले इस तरह की बीमारी में ओपन सर्जरी ही एकमात्र इलाज होता था। लेकिन बड़ी सर्जरी और मस्तिष्क को सामान्य स्थिति में नहीं आने का खतरा हमेशा बना रहता था। इन दिनों ज्यादातर ऐसे मरीजों का एंडोवैस्कुलर क्वॉयलिंग तकनीक के जरिये न्यूनतम शल्यक्रिया से इलाज किया जाता है। एन्यूरिज्म के इलाज के लिए उपलब्ध फ्लो डायवर्टर सबसे प्रभावी और सबसे नई टेक्नोलॉजी मानी जाती है और ब्रेन की बड़ी रक्तनलिकाओं में सिर्फ इसे ही लगाया जा सकता है। नई पीढ़ी के इस पाइपलाइन वेंटेज के आविष्कार से आर्टेमिस हॉस्पिटल के डॉक्टरों की टीम दक्षिण एशिया और भारत की पहली ऐसी टीम बन गई है जिसने सबसे छोटे डायवर्टर को सफलतापूर्वक मस्तिष्क में प्रत्यारोपित कर मरीज की जान बचा ली।

दक्षिण एशिया में अपनी तरह की पहली सर्जरी को अंजाम देते हुए आर्टेमिस हॉस्पिटल की न्यूरोइंटरवेंशन टीम ने ब्रेन एन्यरिज्म से पीडि़त 48 साल की महिला की जिंदगी बचाई। कुछ साल पहले एन्यूरिज्म क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण मरीज को ब्रेन हेमरेज हो गया था, जिसके लिए आपात स्थिति में उसका क्वॉयलिंग से इलाज किया गया। इससे वह पूरी तरह रिकवर भी हो गई। लेकिन रक्तनलिकाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण एन्यूरिज्म का छोटा हिस्सा छूट गया और एंजियोग्राफी से पता चला कि यह फिर से बढऩे लगा है। चूंकि मरीज को फिर से हेमरेज होने का खतरा था और दोबारा बढ़े हुए एन्यूरिज्म का इलाज क्वॉयलिंग से संभव नहीं था, इसलिए डॉक्टरों की टीम ने फ्लो डायवर्टर का इस्तेमाल करने का फैसला किया।

देश में पहली बार किसी मरीज पर पाइपलाइन वेंटेज फ्लो डायवर्टर इस्तेमाल करने वाली टीम बनने पर हमें गर्व है। एन्यूरिज्म चूंकि छोटी रक्तनलिका पर थी, इसलिए हमने आधुनिक पाइपलाइन वेंटेज डिवाइस का इस्तेमाल किया। यह प्रक्रिया सफल रही और मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो गया। इस पतले डिवाइस को छोटे-छोटे ट्यूबों के जरिये डाला जाता है इसलिए यह प्रक्रिया सफल और सुरक्षित रही। इस डिवाइस का इस्तेमाल जटिल ब्रेन एन्यूरिज्म से पीडि़त कई मरीजों पर किया जा सकता है जिसमें आधुनिक फ्लो डायवर्टर डिवाइस का सफल इस्तेमाल होता है।

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