उधमपुर बम विस्फोट के बाद जम्मू-कश्मीर जेल विभाग के महानिदेशक की हत्या से ये बात साफ हो गई है कि देशविरोधी संगठन जम्मू-कश्मीर का माहौल खराब करना चाहते हैं। ऐसे समय जब जम्मू कश्मीर में होने जा रहे तब इस तरह की घटनाएं चिंता का कारण बन रही हैं। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस वक्त जम्मू कश्मीर के तीन के दौरे पर हैं।

धारा 370 हटने के बाद धीरे-धीरे घाटी का माहौल शांत हो रहा था। सरकार का पूरा प्रयास है कि जम्मू कश्मीर का माहौल सामन्य हो जाए और वहां चुनाव करवाकर एक चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंप दी जाए। लेकिन धारा 370 के हटने के बाद से तमाम देशविरोधी ताकतों को यह फैसला रास नहीं आया था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जम्मू कश्मीर माहौल को बिगाड़ने की कोशिशें एक बार फिर शुरू हो गई हैं।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने देशविरोधी गतिविधियों में शामिल संगठन पीएफआई का पांच साल के लिये प्रतिबंधित किया था। पीएफआई के प्रतिबंध लगने के बाद हिन्दू बहुल उधमपुर में बम विस्फोट हुए। चूंकि आने वाले दिनों में जम्मू कश्मीर में विधानसभा में चुनाव होने वाले हैं ऐसे में उधमपुर में हुए बम विस्फोट साधारण नहीं माने जा सकते। कश्मीर घाटी के प्रवेश द्वार पर किये गये धमाके पी.एफ.आई की करतूत है या किसी अन्य आतंकवादी संगठन की ये तो जांच में पता चल सकेगा। गृह मंत्री के दौरे के दौरान जम्मू-कश्मीर जेल विभाग के महानिदेशक हेमंत कुमार लोहिया की हत्या के मामले ने माहौल का गर्मा दिया है। पुलिस के मुताबिक हेमंत कुमार लोहिया कि हत्या उनके घरेलू सहायक ने की है। आरोपी घरेलु सहायक की पहचान रामबन निवासी यासिर अहमद के तौर पर हुई।

धारा 370 हटने के बाद ढाई साल से अधिक समय में घाटी में आतंकवाद की कमर लगभग टूट चुकी है। आतंक की राह पर जाने वाले युवाओं की संख्या कम हुई है। पत्थरबाजों का साथ नहीं मिल रहा है। सुरक्षा बलों की ओर से लगातार शिकंजा कसते हुए आतंकी तंजीमों के कमांडरों का एक-एक कर सफाया कर दिया गया है। इससे आतंकियों को कोई बड़ा मौका हाथ नहीं लग पाया है। बताया यह भी जा रहा है कि खुफिया सूत्रों के अनुसार आतंक के मोर्चे पर अपना गेम प्लान फेल होता देख पाकिस्तान अब नए सिरे से घाटी में हिंसा का माहौल बनाने की साजिशों में जुटा है। इसी के तहत पंचायत प्रतिनिधियों और पुलिस व सेना के निर्दोष जवानों की टारगेट किलिंग फिर से बढ़ाने की हिदायत दी गई है। मार्च के महीने में टारगेट किलिंग की घटनाओं में इसी वजह से बढ़ोतरी देखने को मिली थी।

अब जम्मू कश्मीर के राजनीतिक समीकरण काफी बदले हुए होगे। मसलन कांग्रेस के सबसे बड़े नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी छोडने के बाद अपनी पार्टी बनाई है। और जो नया परिसीमन हुआ उसके अनुसार जम्मू क्षेत्र में सीटों की संख्या बढने से मुस्लिम बहुल घाटी का वर्चस्व पहले जैसा नहीं रहेगा। इसके अलावा केंद्र सरकार ने वाल्मीकि समाज के उन लोगों को मताधिकार दे दिया जो तीन पीढ़ी पहले पंजाब से सफाई मजदूर के तौर पर लाये गये थे। उनके परिजन सफाई कर्मी की सरकारी नौकरी तो पाते रहे लेकिन आज तक इस वर्ग को मत देने का अधिकार नहीं मिला। इसी तरह जो शरणार्थी विभाजन के बाद पाकिस्तान से आये उनको भी जम्मू कश्मीर का नागरिक नहीं माना गया। अब इनके नाम भी मतदाता सूची में दर्ज हो गए हैं।

यही नहीं तो जिन कश्मीरी पंडितों को 1990 में घाटी छोडने पर मजबूर किया गया था वे भी बाहर से आकर मतदान कर सकेंगे। ताजा खबर ये है कि बकरवाल और गुज्जर जैसी घुमंतू जातियों को आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था भी की जा रही है। जैसी कि खबर है घाटी के भीतर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के अलावा अन्य छोटी-छोटी पार्टियों में गठबंधन के प्रयास कारगर नहीं हो पा रहे। गुलाम नबी के अलग दल बना लेने के बाद ये संभावना भी बन रही है कि उनका भाजपा से गठबंधन हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तब घाटी के भीतर अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के दबदबे में कमी आना तय है। कांग्रेस के ज्यादातर नेता श्री आजाद के साथ आ जाने से पार्टी के पास कोई बड़ा प्रभावशाली चेहरा बचा ही नहीं है।

धारा 370 हटने के बाद कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सुधरी है। यद्यपि अभी भी आतंकवादी यदा-कदा घाटी में रह रहे हिन्दुओं की हत्या कर देश के बाकी हिस्सों में बसे कश्मीरी पंडितों को घाटी में लौटने का इरादा त्यागने की चेतावनी देने से बाज नहीं आते लेकिन सुरक्षा बल भी आये दिन उन्हें मारकर उनकी कमर तोड़ रहे हैं। इस वजह से जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकली भीड़ न तो पाकिस्तानी झंडा लहराती है और न ही भारत विरोधी नारे लगाने की हिम्मत कोई करता है। जम्मू-कश्मीर के माहौल में न केवल बदलाव आया है, बल्कि आर्थिक विकास और पर्यटन को पंख लगे हैं। विकास का पहिया भी तेजी से घूम रहा है।

श्रीनगर के लाल चौक पर आजादी के दिन तिरंगा उतारकर पाकिस्तानी ध्वज फहराने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ी। इस वर्ष तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शोभा यात्रा भी निकली और खीर भवानी में पूजा करने कश्मीर के साथ ही बाहर से भी हिन्दू श्रृद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र हुए। द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने तीन अगस्त को संसद में एक प्रश्न के जवाब में भी कहा कि इस साल तीन जुलाई तक 1.06 करोड़ पर्यटक जम्मू-कश्मीर पहुंचे। सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम स्टे की सुविधा शुरू की है। एलओसी पर भी होम स्टे बनाए जा रहे हैं, जहां पर्यटक सीमावर्ती इलाके का सौंदर्य निहारने पहुंच रहे हैं। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सरगना और नब्बे के दशक में आतंकवाद का चेहरा रहे यासीन मलिक को टेरर फंडिंग मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई गई, लेकिन कश्मीर की जनता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

केंद्र सरकार द्वारा संचालित विकास योजनाओं के लिए मिल रहे धन की वजह से घाटी में उत्साह का संचार हुआ है। सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित परीक्षाओं में कश्मीरी युवा खुलकर भाग ले रहे हैं।

राष्ट्रपति शासन लगने के बाद श्रीनगर से दिल्ली तक के राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण तीव्र गति से चलने से घाटी का शेष भारत से सम्पर्क और करीबी हो रहा है। रेल सुविधा से भी घाटी को जोडने का काम तेजी पर है। हालांकि बीच में हुई सिलसिलेवार घटनाओं के बाद घाटी में रहने वाले हिन्दू सरकारी अमले ने जम्मू स्थानान्तरण करने की जिद ठान ली थी। इसे लेकर भाजपा को उनका विरोध भी झेलना पड़ा।

ये कहना भी गलत न होगा कि राज्य में चुने हुए जनप्रतिनिधि न होने से जनता और प्रशासन के बीच संवादहीनता भी अनेक समस्याओं का कारण बनती है। इसलिए ये अपेक्षा की जा रही है कि चुनी हुई सरकार बनने के बाद हालात और सुधरेंगे। इसी डर से आतंकवादी संगठन चुनाव प्रक्रिया में व्यवधान डालने से बाज नहीं आयेंगे। उन्हें पता है कि राज्य में स्थायी तौर पर शान्ति-व्यवस्था कायम हो गयी तब उनकी दुकानें बंद होने में देर नहीं लगेगी। सैयद अली शाह गिलानी की मौत और यासीन मलिक के जेल जाने के बाद से घाटी में अलगाववादी ताकतें पूर्व की तरह ताकतवर नहीं रहीं। उनकी स्थिति दरअसल बिना राजा की फौज जैसी हो गई जिसे आतंकवादी हजम नहीं कर पा रहे और इसीलिए वे विधानसभा चुनाव में व्यवधान डालने का हरसंभव प्रयास करेंगे। ऐसे में सुरक्षाबलों का और चौकसी बरतने की जरूरत है।

लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

By VASHISHTHA VANI

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